छिः!


( कहानी 'छिः!' कहानीकार की सफलतम नारीवादी कहानियों में से एक है। इस कहानी में नारी के अंतर्मन के कई गोपनीय पहलुओं पर अति-सूक्ष्मता से प्रकाश डाला गया है । यह कहानी मूल रूप से नब्बे के दशक में लिखी गई थी.। सर्व-प्रथम यह कहानी ओडिया पत्रिका 'झंकार' में प्रकाशित हुई और बाद में लेखिका के कहानी-संग्रह "दुःख अपरिमित" (ISBN : 81-7411-483-1) में संकलित हुई । ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में शोध कार्यरत प्रतिष्ठित लेखिका गोपा नायक ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद Hatred शीर्षक से किया है,जो वेब-पत्रिका Thanal On Line में प्रकाशित हुआ है ।)

1
उसके घुँघराले बालों में कंघी करने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी। सर्पिल लटों के गुच्छे के रूप में बाल बिखरकर आँख, कान, नाक के ऊपर गुलदस्ते की तरह झूलने लगते थे। जब भी नानी उनके घर मिलने आती थी, तो अपने साथ बहुत सारी छोटी-मोटी चीजें लेकर आती थी। कभी-कभी अरण्डी का तेल भी साथ लेकर आती थी। रस्सी से बुनी हुई खटिया में बैठकर गोंद जैसे चिपचिपे अरंडी के तेल को लगाकर गाय के सींग से बनी कंघी से जब नानी उसके बाल बनाती थी , तो उसे रोयेंदार भेड़ों के बालों की याद आती थी। उसने एक बार पठानों की बस्ती में बकरियों के साथ भेड़ों की टोली देखी थी। उस टोली में आस्ट्रेलिया या हिमालय पहाड़ के आस-पास के इलाकों में रहने वाली भेडें नहीं थी। वे तो तटीय उड़ीसा की भेडें थी। मलिन पीले वर्ण वाले शरीर में एक-एक इंच ऊन की रोयेंदार गांठे भरी पड़ी थीं। अपने ऐसे बालों के बारे में सोचकर वह बहुत दुःखी हो जाती थी। नानीजी के बोलने का तात्पर्य झट से उसकी समझ में आ जाता था। अरंडी का तेल बालों में लगाते ही सिर पर बाल इस तरह चिपक जाते थे मानो किसी ने गोंद से चिपका दिए हो। कक्षा में पढ़ाते समय अध्यापकगण अक्सर बच्चों को कहते थे कि वे सोते समय अपनी नानी से ध्रुव, प्रहलाद, श्रवण कुमार आदि के बारे में पौराणिक कहानियाँ अवश्य सुनते होंगे। उसकी राय में अध्यापकों की दोनों बातें झूठी थीं । पहली, इसलिए कि नानी पौराणिक कहानियाँ नहीं सुनाती थी ; दूसरी, इसलिए कि वह सोते समय तो कभी कहानियाँ नहीं सुनाती थी। वह केवल कंघी करते समय अजीबो-गरीब किस्म की कहानियाँ सुनाती थी, जो उसके कोमल-चित्त पर हमेशा के लिए अंकित हो जाती थी।
उन सब कहानियों में से दो कहानियाँ अभी तक उसे पूरी तरह से याद है। पहली कहानी इस प्रकार थी।बहुत पुरानी बात थी। पता नहीं, किन राज्यों से मराठा उड़ीसा आए थे। गाँव-गाँव में आक्रमण कर , सारे घरों में घुसकर वे लूटपाट कर सब तहस-नहस कर देते थे। बोलते -बोलते कुछ क्षण के लिए नानी चुप हो गई । इसके बाद एक लम्बी सांस लेते हुए फिर से कहने लगी कि जब वह आँगन की तरफ काम कर रही थी तो कोई जोर से चिल्लाया, "मराठा आ रहे हैं गाँव की तरफ ! भागो ,जल्दी भागो ।"
देखते-देखते ही सारा गाँव सूना हो गया। जिसको जो रास्ता मिला, उसी रास्ते से पहाड़ के ऊपर भाग गया , घर के सारे मवेशी गाय-भैंसे गोशाला के अंदर ऐसे ही बंधे छोड़कर। सब-कुछ ऐसे ही छोड़कर भाग जाते थे; रुपया-पैसा, धान, चावल, मूँग, उड़द। तब किसको ये चीजें याद रहती। तब तो केवल यह एक चीज ही याद रहती ' भागते भूत की लंगोटी भली'। यहाँ तक कि सत्तर वर्षीय बुढ़िया, 'नौलियाँ की माँ' भी अपनी लाठी पकडकर धीरे-धीरे पहाड़ की तरफ चली गई थी। नहीं जा पाई थी तो सिर्फ हलवाई की बहू। जाती भी तो वह कैसे जाती ? गर्भवती जो ठहरी। उसका नौवां महीना चल रहा था। मराठों के आने की बात सुनकर उसको प्रसव-शूल शुरू हो गया था। पेट में बच्चा था, पहाड़ पर कैसे चढ़ती ? सास-ससुर, पति-देवर, ननद सब, उसे अकेले छोड़कर अपने प्राण बचाने के लिए भाग गए थे। आपत्ति-काल में कौन किसको पूछता है ! हलवाई की बहू कैसे जाती ? उसके पेट के भीतर बच्चा बाहर निकलने का प्रयास करने लगा।
वह कहने लगी -"आप लोग जाइए, मेरी खातिर क्यों अपनी जान देंगे ? मराठा मुझे खाकर संतुष्ट हो जाएँगे।"
ऊपरी मन से कह तो दिया था, मगर गाँव के अंतिम छोर से आने वाले घोड़ों के खुरों की टॉप-टॉप आवाज सुनकर भय से प्रसव शूल और बढ़ गया तथा देखते-देखते उसने एक बच्चे को जन्म दे दिया ।वेदना के मारे उसकी आँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी । उसका यह पहला प्रसव था। धीरे-धीरे उसने स्वयं उठकर सीपी की सहायता से बच्चे की नाल काटी और बच्चे को साफकर गोदी में लेकर बैठ गई। तभी सदल लुटेरे मराठे उनके गाँव पहुँच गए। उन्होंने इधर-उधर देखा। सारा गाँव निर्जन सुनसान पडा था। क्रोधित होकर उन्होंने उत्पात मचाना शुरु कर दिया.। किसी के बरतन फेंके,तो किसी के घर जला दिए। सब बरबाद करके जब वे उस हलवाई के घर पहुँचे तो उन्होंने उस प्रसूता स्त्री को देखा। आठ-दस खूँखार आदमियों ने उसको चारों तरफ से घेर लिया।
"कहाँ गए गाँव के सारे लोग ?"
वह क्या बोलती, उसका शरीर डर से थर-थर काँप रहा था। मुँह की बोलती बंद थी। मुँह से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था। ड़री हुई आंखों से वह केवल इधर-उधर देख रही थी। मराठों का मुखिया कहने लगा,"ऐसे आँख फाड़-फाड़कर क्या देख रही हो ? चूल्हा जला, हमें जोरों की भूख लग रही है। तेल की कड़ाही चढ़ा और तुम्हारी गोदी में जो दुधमुँहा बच्चा है, उसको तल-भूनकर दे, हम लोग खाएँगे।"
हलवाई की बहू का पहला नवजात शिशु लड़का पैदा हुआ था, एक पल के लिए भी अपने लाड़ले बच्चे को ढंग से निहार नहीं पाई थी। अभी तक तो उसको स्तन-पान भी नहीं कराया था। माँ के मन पर क्या गुजरी होगी ! बड़े ही धैर्य के साथ वह साहसपूर्वक कहने लगी "बच्चे को खाना चाहते हो, ठीक है। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए। अपने स्थान पर चुपचाप बैठे रहिए।"
नवजात शिशु को गोदी में लेकर चूल्हा जलाया, तेल गरम किया। तेल जब उबलने लगा। अचानक खड़ी होकर, तेल उबालने वाले जाले से उन पर गरम तेल तेजी से छींटने लगी।"बापरे ! जल गए, मर गए, मर गए"- कहते-कहते वे लोग भाग खड़े हुए। नानी कहती थी, यह उनके बचपन की बात थी। अगर पारिजात उम्र में बड़ी होती तो वह समझ पाती कि यह बात नानी के बचपन में घटित हुई होगी। अभी तो वह मराठों के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। वह तो सोच रही थी कि मराठे देखने में जरूर हाथी, घोड़े , शेर, भालू व राक्षस जैसे होंगे, अन्यथा नर-मांस खाने की मांग क्यों करते ? नानी की दूसरी कहानी को भले ही वह अविश्वास की दृष्टि से नहीं देखती थी, मगर वह कहानी उसे बहुत दुखी करती थी। मन छिः से भर जाता था। नानी कंघी करते समय अरण्डी के तेल से उसकी पीठ पर मालिश करती हुई कहती थी, "यह तो मेरी सोने की पीठ है ! इसके जन्म के बाद ही घर में पहले बेटे का जन्म हुआ है ।"
वह छोटी-सी कहानी सुनाती थी। कई देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना, मिन्नत-माँगने के बाद जब माँ निराश हो गई थी, तब नानी कहीं से एक परीक्षित पुत्रेष्टि उपाय सुनकर आई थी और उसका माँ पर प्रयोग किया। एक दिन पारिजात के मल से उदर-कृमि निकालकर पके केले के अंदर छुपाकर माँ को खिलाया था नानी ने। यह तो शायद संयोग की बात थी। इधर कौए का बैठना हुआ, उधर डाली का टूटना हुआ। इस बार माँ को बहु-प्रतीक्षित बेटा यानि पारिजात का छोटा भाई पैदा हुआ। जिस दिन से नानी ने वह कहानी सुनाई थी, उस दिन से नानी के प्रति उसका मन छिः से भर गया । उसके बाद वह कभी भी नानी के पास कंघी कराने नहीं बैठी। तब से वह नानी को अविश्वास की आँखों से देखने लगी । उसे लग रहा था माँ बुरी तरह प्रताड़ित हुई है। उसे अपनी माँ पर बहुत दया आ रही थी ।


2
बचपन से ही उसके स्मृति-पटल पर अंकित थीं वे अश्रुपूरित दो आँखें। जैसे ही वह शाम को घर में जलते हुए साठ-वाट के बल्ब देखती थी, वैसे ही उसे वे दो आँखें याद आ जाती थीं। उसके बाद धीरे-धीरे सफेद ब्लाउज व सफेद साड़ी पहनी हुई अधेड़ उम्र वाली एक औरत आँखों के सामने प्रत्यक्ष दिखाई देने लगती थी। उस औरत की बात में पता नहीं, ऐसी क्या व्यथा थी ! उसकी वे बातें याद आते ही परिजात की समग्र चेतना हिल जाती थी। उस औरत की बातों में इतनी कशिश थी कि सुनने-मात्र से गहरे पानी में डूब जाने जैसा प्रतीत होने लगता था।
बड़ी व्याकुलता से वह कहती थी- "दे, दे, ऐ रीना की माँ ! मेरे बाल-बच्चों ने सुबह से कुछ नहीं खाया है। ऐसे ही भूखे बैठे हैं। किसी के भी पेट में अनाज का एक दाना भी नहीं पड़ा है।" उसके हाथ में एक झोला था। उसकी वह व्याकुल आवाज पारिजात की माँ के कानों तक नहीं पहुँचती थी। थक-हारकर, वह औरत जमीन पर बैठकर आँखों के आँसू पोंछने लगती थी। यह देखकर कुछ समय बाद माँ नाक-भौं सिकोड़कर कहने लगती, "रोज-रोज आओगी, तो कहाँ से दूँगी ? आज शाम को फिर से चली आई हो, मेरा कोई दूसरा काम नहीं है क्या ?" माँ से फटकार सुनने के बाद भी वह औरत जमीन पर यथावत बैठी रहती थी। उसको ऐसे ही बैठा देख, माँ गुस्से से हाथ में पकडे हुए बरतन फेंक देती थी, नहीं तो, झाडू को धड़ाम से जमीन पर नीचे गिरा देती थी और झन-झन आवाज करती हुई तेजी के साथ घर के भीतर चली जाती थी। फिर कुछ समय बाद, घर के अंदर से एक चक्कर काटकर बाहर लौट आती थी।फिर उस औरत को वहीँ बैठा देख आवेश में आकर वह चिल्लाने लगती थी-
"अब तक तुम नहीं गई हो ? बोली न, मेरे पास चावल नहीं है। कहाँ से लाकर दूँगी ?"
"दे, दे, न, रीना की माँ ! ज्यादा नहीं, एक मुट्ठी चावल दे दे, नहीं तो मेरे बच्चे भूख से तड़प-तड़पकर मर जाएँगे। मेरी बहिन, दे, दे।"
ऐसा कहकर वह माँ का हाथ पकड़ लेती थी तथा जोर- जोर से गिड़गिड़ाने लगती थी । तब भी माँ का कठोर दिल नहीं पसीजता था।उस समय परिजात को अपनी माँ में एक आदर्श माँ जैसी करुणा नजर नहीं आती थी। तब उसका मन होता था, खुद जाकर चावल के ड्रम में हाथ डालकर दो-चार मुट्ठी चावल लाकर सविता की माँ को दे दे। उसे तो यह भी मालूम नहीं था, सविता के घर वाले गरीब है अथवा अमीर। परन्तु उसे यह मालूम था कि वह सम्भ्रान्त कायस्थ घर की विधवा थी; इसलिए सफेद ब्लाउज व सफेद साड़ी पहनती थी । उसका माँ के सामने दो मुट्ठी चावल के लिए हाथ फैलाकर एक भिखमंगे की तरह गिडगिडाने वाला दृश्य उसके दिल को कचोटता था । उसे वह दृश्य बड़ा ही दयनीय लगता था। उसका मन कह रहा था कि हर हालत में माँ को चावल दे देने चाहिए। उनके घर में चावल के बोरों के ढेर थे । एकाध मुट्ठी चावल दे देने से क्या फर्क पड़ जाता ? ऐसे भी तो चूहे हर साल एक चतुर्थांश चावल हजम कर जाते थे। हर रोज कटोरे भर-भरकर जूठा भात गायों के कुंड में डालते थे। एक कटोरा भात के लिए किसी मनुष्य की आँखे आँसुओं से डबडबा जाएगी, ऐसा सोचने मात्र से ही उसे खराब लगने लगता था।
वह माँ को कहती थी, "आपने सविता की माँ को चावल क्यों नहीं दिए ? इतना रो-धोकर वह खाली हाथ अपने घर चली गई। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।"
माँ झल्लाकर चिल्लाने लगी, "क्या मेरे यहाँ चावल मुफ्त में आते हैं ? आगे चातुर्मास है, इसलिए धान उबालकर ‘उष्णा’ चावल बनाकर रखी हूँ, जो कोई भी भिक्षा माँगने आएगा, उसमे से मैं दे दूँगी ? उसकी माँ किसी को कुछ भी नहीं देती थी। गिरीयापान सप्ताह में दो बार भीख माँगने आता था। वह बाहर के आँगन में बैठकर भीख माँगता था। उसकी आवाज सुनते ही माँ तुरंत परिजात के हाथों में एक कटोरी चावल देकर भेज देती थी यह कहते हुए
"जा, उसे जल्दी यहाँ से विदा कर।" लंबे-चौड़े शरीर वाले उस आदमी का बुढापे की वजह से चेहरा भले ही बहुत मलिन दिख रहा था, मगर तब भी उसकी आँखे दहकते हुए अंगारों की भाँति लाल दिखाई देती थी। उसके झोले में चावल डालते समय वह माँ के हालचाल के बारे में पूछता था, पापा टाउन में है अथवा बाहर ? टाउन के बीच उनका घर होने से, क्या उन्हें वाहनों के शोरगुल में नींद ठीक से आती हैं अथवा नहीं ? आदि बातें पूछता था। माँ कभी भी घर से बाहर नहीं निकलती थी। घर के अंदर से ही बड़बड़ाने लगती थी,
"चाचा, तुम इतनी खोज-खबर क्यों ले रहे हो ?"
माँ की बात सुनकर गिरीयापान अपनी लम्बी लाठी के सहारे खड़ा होकर जाने के लिए तैयार हो जाता था। परिजात के घर के भीतर जाते ही माँ पूछती थी "गिरीयापान क्या पूछ रहा था ?"
"कुछ भी नहीं, आपके और पापा के बारे में।" माँ डरकर कहने लगती थी"तुमने कह दिया क्या, पापा दो दिन से घर पर नहीं हैं।"
माँ गिरीयापान से बहुत डरती थी। उसके मन में गिरीया के प्रति एक विचित्र धारणा घर कर गई थी। गिरीयापान भीख माँगने के बहाने घर के अंदर की जानकारी प्राप्त कर किसी बेशकीमती चीज को चतुरता से अपने हाथ की सफाई से साफ करना चाहता है । कहाँ रूपए-पैसे रखे जाते हैं ? कहाँ सोना-चांदी रखी जाती हैं ? सारी गोपनीय जगहों के बारे में गिरीया शायद जानता है। जरूर, एक दिन धावा बोलकर सब लूटकर ले जाएगा। गिरीयापान पारिजात के ननिहाल का आदमी था। इस वजह से माँ उसे चाचा कहकर पुकारती थी। इसकी वजह श्रद्धा-भाव नहीं, बल्कि डर से वह उसे चाचा कहकर पुकारती थी। वह कभी-कभी भावुकतावश डर से कहने लगती थी ,"देख, चाचा ! मैं तेरी भतीजी हूँ। एक ही गाँव में हम पैदा हुए हैं। तुम मेरे घर पर कम से कम अपनी कुदृष्टि मत डालना।"
पारिजात को माँ की इस बात पर हँसी आती थी। एक भिखारी डकैत कैसे हो सकता है ? अगर वह डाकू होता तो, क्या दो मुट्ठी चावल के लिए द्वार-द्वार भटकता फिरता ? पारिजात की ये बातें सुनकर उसकी माँ एक जासूसी उपन्यास की तरह गिरीयापान की कहानी सुनाती थी। "एक बार का समय था । गिरीयापान जब जवान था, तब वह बहुत ही खतरनाक डाकू हुआ करता था। उसके खौफ से न केवल उनका गाँव , बल्कि आस-पास के कई गाँव थर्राते थे। राजा-जमींदारों का समय था वह । प्रत्येक राजा अन्य राजाओं के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। चाहे वे कोई अच्छे काम हो, चाहे वे कोई बुरे काम हो। एक बार उनके गाँव में राजा ने गिरीया को अपने महल में आमन्त्रित किया । चूँकि वह एक दुर्दान्त डाकू था, इसलिए वह राजा के डर से बुलावे पर नहीं गया। वह कुछ समय के लिए भूमिगत हो गया था। एक दिन राजा स्वयं अपने दरबारियों के साथ कुछ कीमती उपहार लेकर गिरीया के घर पहुँचे। गिरीया के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। घर से बाहर निकल कर अपनी धृष्टता के लिए क्षमा-याचना करने लगा। उस समय राज-महल में अंग्रेजों का आना-जाना लगा रहता था। राजा गिरीया को महल के अंदर बुलाकर कहने लगे-
"देख, गिरीया ! तुम अगर एक सच्चे पान की औलाद हो, तो एक काम करके दिखाओ ।"
गिरीया की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि क्या काम करना पडेगा। राजा आगे कहने लगे, "तुम मधुपुरगढ़ जाओ, वहाँ रानी के स्नानागार से उसके पहने हुए कपड़े अगर ला पाओगे, तब मैं तुम्हें बहादुर का बच्चा समझूँगा।"
गिरीया ने उत्तर दिया, "बस, इतनी सी बात !"

सचमुच, गिरीया मधुपुरगढ़ किसी गंदे नाले के अंदर से होते हुए, पता नहीं किस चतुराई से, मधुपुर रानी के स्नानागार में पहुँच गया और उसके पहने हुए कपड़े निकालकर बाँस के पोल में छुपाकर ले आया।यह थी गिरिया पान की बहादुरी की कहानी। फिर वह कहने लगी , "जानती हो, बेटी ! उसके आँख-कान हर समय सचेत रहते हैं।" बचपन के उन दिनों में पारिजात को इतनी बुद्धि कहाँ से आई, पता नहीं, माँ के मुख से गिरिया की कहानी सुनकर तपाक से कह उठी "तू डरकर गिरीया को चावल देती है। उसको देते समय तुम्हारा चातुर्मासी चावल खत्म नहीं होता है, पर सविता की दुखियारी माँ को देते समय चावल खत्म हो जाते हैं। आप अच्छी औरत नहीं हैं।"
माँ झल्लाकर चिल्ला उठती "क्या बोली ?" मार खाने के डर से भागकर पारिजात रास्ते की किसी दूर दुकान के बेंच पर जाकर बैठ जाती थी। उसका मन विद्रोह कर बैठता था, छिः से भर जाता था। विद्रोह या विरोध ? मगर छिः ! किसलिए ?


3
गुसलखाने के पैन पर थप-थप गिर रही थीं खून की बूँदे। सफेद पैन के ऊपर गिरती खून की बूँदे सूर्योदय की लालिमा जैसे सुंदर चित्र तैयार कर रही थी। उस दृश्य को देखकर पारिजात को एक लोकप्रिय कहानी याद आ जाती थी।
एक रानी थी। महल के झरोखे में बैठकर वह एक रुमाल पर अनमने ढंग से कशीदा निकाल रही थी। निसंतान होने की वजह से रानी का मन अशांत रहता था ।राजा की उम्र धीरे-धीरे ढल रही थी। संतान के बारे में सोचते-सोचते, रानी इतनी भाव-विह्वल हो गई थी कि उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई थी। केवल आँसू ही नहीं, अनमना होने की वजह से उसकी अंगुली में सुई चुभ गई थी। उफ ! आवाज के साथ रानी ने अपनी अंगुली दबा ली, जिससे तरल खून की एक बूँद अंगुली के ऊपर चमकने लगी। धीरे से उसने खून की बूँद को नीचे झटक दिया। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी।। महल के चारों तरफ नरम-नरम रूई के समान बर्फ का आवरण आच्छादित था। खून की बूँद वहां गिरते ही, दूध व अलता जैसे सम्मिश्रित वर्णयुक्त अजीब-सा दृश्य खिल उठा था। उसे देखकर रानी सोचने लगी कि काश ! ऐसी सुन्दर मेरी लड़की होती ! उसी समय एक परी आकाश-मार्ग से गुजर रही थी। उसने रानी के मन की बात को जान लिया। नीचे उतरकर रानी के पास आकर कहने लगी, "तुम्हारी कोख से इतनी सुंदर लड़की का जन्म अवश्य होगा, परन्तु उसके पैदा होते ही तुम्हारी मौत हो जायेगी। क्या तुम्हें यह शर्त मंजूर है ?"
रानी परी की बात सुनकर बहुत खुश हो गई , तथा बिना कुछ सोचे-समझे उसने "हाँ" कह दिया। रानी सोचने लगी, मेरी जिंदगी के बदले अगर महलों के अंदर एक सुंदर अप्सरा तितलियों की तरह घूमेगी-फिरेगी, तो उससे बढ़कर खुशी की और क्या बात हो सकती है ? वह विस्मित होकर पुनः उस स्थान को देखने लगी, जहाँ खून की बूँद के गिरने से अभूतपूर्व वर्ण-विभा की सृष्टि हुई थी।इतनी सुंदर लड़की एक दिन धरती पर अवतरित होगी !
पैन में वह खून देखकर रानी की तरह पारिजात विचलित नहीं हुई थी। कुछ महीनों से लगातार इसी तरह रक्त-स्राव हो रहा था। यही सोच कर वह ये बातें किसी को बताती नहीं थी। एकबार अरविंद ने कहा, "नहीं और नहीं चलेगा, अब डॉक्टर को दिखाने का समय आ गया है । कभी भी किसी बीमारी को ज्यादा पुरानी नहीं होने देना चाहिए।" समाचार पत्र में प्रकाशित इस संदर्भ में एक डॉक्टर के लेख को पढ़कर अरविंद इतना प्रभावित हुआ था कि पारिजात को लेकर उसके नर्सिंग-होम में पहुँच गया।
वह डॉक्टर जटिल रोगों व उनके सरल उपचार के बारे में बोधगम्य भाषा में लेख लिखा करता था अपने पाठकों के लिए । प्रत्येक बीमारी का कारण अगर आधा शारीरिक है, तो आधा मानसिक, इसी युक्ति को बखूबी से प्रमाणित करते थे । इसी बात को डॉक्टर की दक्षता व योग्यता का प्रमाण मानकर, वे दोनों दोपहर के समय उनके घर पहुँचे थे। उस समय डॉक्टर आराम कर रहा था। उस दिन रोगी को देखने का उनका काम पूरा हो गया था । अरविंद ने कहा, "डॉक्टर के पास समय-असमय क्या है ? आज मैं ऑफिस से भागकर आया हूँ ,कल भागकर आना मुश्किल है।"
अरविंद ने कॉल-बेल बजाई । कुछ समय बाद डॉक्टर खुद बाहर निकला। वह अधेड़ उम्र का स्थूलकाय आदमी था। वह उन दोनों को प्रश्नवाचक नेत्रों से देखने लगा।
-"आप डॉक्टर प्रधान हैं ?"
-"जी, कहिए ।"
-"सर, ये मेरी धर्मपत्नी है।"-
फिर अरविन्द ने शुरु से पारिजात की बीमारी के बारे में बताया। दोनों कुर्सी में बैठकर बातें कर रहे थे।
-"आपके पेडू में दर्द है ? मलद्वार में जलन है ? पैन के ऊपर खून गिरता है। अच्छा, अच्छा चलिए, देख लेते हैं।-
अरविंद अपनी कुर्सी में बैठा रहा। डॉक्टर प्रधान पारिजात को लेकर अंदर चले गए । उन्होंने अपने चैम्बर की लाइट ऑन की तथा पारिजात को परीक्षण - टेबल पर लेटने के लिए निर्देश दिया । दो सीढ़ी चढ़कर, पारिजात परीक्षण - टेबल पर लेट गई ।
-"ऊह, ऊपर की तरफ देखकर नहीं, घुटनों के बल उकडू बन कर बैठिए ।"
पारिजात घुटनों के बल उकडू बन कर बैठ गई ।
-"नहीं, ऐसा नहीं, थोड़ा आगे की ओर झुक जाइए, एक चौपाये जानवर की तरह।"
डॉक्टर का कहना मान वह चौपाये जानवर की तरह आगे की ओर झुक गई । डॉक्टर प्रधान ने जाँच करना शुरु किया। संकोचवश पारिजात की मांसपेशियां सख्त होने लगी। यह सोचकर अपने आपको ढांढस बँधा रही थी कि वह रोगी है अर्थात् वर्तमान में वह प्रयोगशाला का एक विषय है। जैसे रोगी की कोई जाति नहीं होती है, न कोई धर्म होता है, न कोई लिंग होता है, न कोई उम्र होती है, ठीक उसी प्रकार डॉक्टर की भी न कोई जाति, न कोई धर्म, न कोई लिंग और उम्र होती है। अचानक डॉक्टर प्रधान का हाथ पास वाले स्विच-बोर्ड की तरफ गया तथा उन्होंने परीक्षण-टेबल के ऊपर लगी लाइट को बुझा दिया।
पारिजात ने अपनी छठी इन्द्रिय से अनुमान लगा लिया, डॉक्टर प्रधान कोई भगवान तो नहीं है। वह भी इंसान है तथा आँख , कान, नाक आदि इन्द्रियों के दास है। उनको भी भूख-प्यास लगती है। जिस प्रकार एक लोभी गाय अपनी इच्छा पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकती, ठीक उसी प्रकार डॉक्टर प्रधान भी हो सकते हैं सर्वभक्षी । कुछ घटना घटित हो, उससे पूर्व ही वह तेजी से भागकर अरविंद के पास आ गई । अरविंद ने पूछा, -" डॉक्टर ने जाँच की ?"
डॉक्टर अंदर की सब लाइट जलाकर दरवाजा खोलकर अपने टेबल के पास आ गए । अरविंद उनसे पारिजात की बीमारी के बारे में पूछने लगा। वह बोले, -"पेशेन्ट, वेरी सेंसिटिव"
अरविंद कहने लगा, -"औरत है न, इसलिए ।"
डॉक्टर नाक फुलाकर फुंफकारने लगा,-"ऊँह, औरत है या और कुछ ?"
यह सुनकर पारिजात चौंक गई ।
डॉक्टर प्रधान के छः इंच चर्बी वाले मोटे पेट , चिपचिपे तेल से खल्वाट पर रंगे हुए कुछ चिपके बाल, साफ- सुथरे चिकने चहरे को देखकर उसे उबकाइयां आना शुरु हो गई । छिः! छिः! उसने साड़ी के पल्लू को मुँह में दबाकर उबकाइयों को रोकने का प्रयास किया तथा वहाँ से तुरंत जाने के लिए तैयार हो गई ।





4
केटरपिलर (इल्ली) की तरह बच्चे बन गए थे ।खाना खाने में तो इच्छा-अनिच्छा का कोई सवाल नहीं उठता था। खाली पेट- भरे पेट का बिल्कुल पता भी नहीं चलता था। जितना भी मिलें, सब-कुछ खाए जाएँ । जहाँ कहीं भी बस रुकती, वहीं पानी की बोतल लेकर उतर जाते थे और मुँह उठाकर सीधे चले जाते थे होटल की तरफ। बेसिन में हाथ- मुँह धोकर एक खाली टेबल पर अपना अधिकार जमा लेते थे । फिर फटाफट खाने की चीजों का आर्डर देने लगते थे। अरविंद और पारिजात की इसमें कोई भूमिका नहीं रहती थी। बहुत सारी चीजें जैसे चिकन, मटर-पनीर, नॉन का आर्डर दे देते थे । बस-स्टैंण्ड के पास का होटल चालू-किस्म का था। तैलीय पदार्थों की चिकनाहट लिए स्टील-गिलास, प्लास्टिक का मैला जग, गंदी पोशाक पहने हुए मनहूस चेहरे-से उदास दिखाई देने वाला लड़का टेबल पर पानी के दो चार गिलास रखकर चला जाता था। घर से लाई हुई पानी की बोतल ज्यों की त्यों बगल में पड़ी रहती थी। बच्चे होटल का पानी पेट भर कर पीते थे। खाना खाते-खाते इन लोगों के चेहरों से पसीने की बूँदे टपकने लगती थी, नाक सुड़सुड़ करने लगती थी। इस हालत में भी बड़े चाव के साथ वे खाना खाते थे। उन लोगों का पेट भर जाने के बाद भी खाना बंद नहीं करते थे। पूरी तरह तसल्ली से खाना खाने के बाद एक चुट्की सौंफ लेकर बाहर आते थे। बस-स्टैंड के एक-दो चक्कर काट लेते थे। फिर कोल्ड-ड्रिंक पीना नहीं भूलते। उनके पेट में तो बिल्कुल भी खाली जगह नहीं रहती थी, इसलिए एक-दो घूँट कोल्ड-ड्रिंक पीने के बाद बचा हुआ कोल्ड-ड्रिंक दुकान में जैसे का तैसा छोडकर बाहर चले आते थे। इसके बाद समय बिताने के लिए इधर-उधर की पत्रिका खरीदने की इच्छा होती थी। किताब की दुकान में जाकर सिनेमा से स्पोर्टस तक की सारी पत्रिकाएं टटोलते थे। पसंद आने से एकाध खरीद लेते थे। वहाँ से लौटते समय टॉफी खरीदना नहीं भूलते थे। हर बार यही क्रम था। जब कभी भी बच्चे गाँव जाते थे इसी तरह इल्ली बन जाते थे। बस का दरवाजा नहीं खुलता था। किसी नासमझ राजा की तरह बस खडी रहती थी। ड्राइवर, कंडक्टर, क्लीनर पहले से ही सब यात्रियों को एक-एककर नीचे उतार कर बस में ताला लगाकर, कहीं अंतर्धान हो जाते थे। खाना-पीना पूरा करने के बाद लघुशंका का कार्यक्रम भी समाप्त हो जाता था। इधर-उधर घूम-फिर कर लौट आते थे बस के पास। पर अभी भी बस का दरवाजा नहीं खुलता था। स्टेशन पर बैठनेकी जगह नहीं थी, इसलिए यात्रीगण मक्खियों की तरह इधर-उधर भिनभिनाते रहते थे। ज्यादा घूमने-फिरने से, तथा लंबे समय तक खड़े रहने से पैर दुखने लगते थे। शरीर थककर चूर हो जाता था, परन्तु बस टस से मस नहीं होती थी, ब्रह्मर्षि की तरह निर्विकार खड़ी रहती थी।
इस बार बच्चे कुछ ज्यादा ही तंग कर रहे थे। खाना-पीना, पत्रिका खरीदना सब-कुछ पूर्ववत् पूरा हो गया था। कुछ भी शेष नहीं था। वे लोग मक्खियों की तरह इधर-उधर भिनभिना रहे थे। तभी कहीं से एक बूढ़ा उनकी तरफ आया। पता नहीं, किसकी तरफ पहले उसने हाथ फैलाया। यह भी याद नहीं आ रहा है, पहले किसने सिर हिलाकर उसे मना कर दिया था। मगर वह बूढ़ा वहाँ से नहीं खिसक रहा था। यह देखकर अरविंद थोड़ा आगे चला गया। धीरे-धीरे सभी ने उनका अनुसरण किया, यहाँ तक कि उस बूढ़े ने भी। बूढ़े को देखकर अरविंद चिल्लाकर बोला-
-"जा, भाग, यहाँ से।" मगर बूढ़ा नहीं गया।
बेटा बोला -"दे, दीजिए न कुछ, बाबा!"
अरविंद ने अपनी जेब में हाथ नहीं डाला। पारिजात ने भी अपने बटुए की चैन नहीं खोली। मगर उस बूढ़े ने अपने कमजोर हाथों को जिद्दी बच्चे की तरह उनके सामने फैलाए रखा । वह अपना हाथ आगे बढाए ही जा रहा था, मानो उन चार लोगों के परिवार के व्यूह को तोडने जा रहा हो। अरविंद क्रोधित होकर कहने लगा, -"जाओ, बोला न, आगे जाओ। तुमको कुछ सुनाई नहीं दे रहा है ? आगे हट, अपना रास्ता नाप।"
अरविंद और थोड़ा दूर चला गया, पीछे पीछे वह बूढ़ा भी। वह बूढ़ा बहुत ही बीमार दिखाई दे रहा था। उसके सफेद घुँघराले बाल, पैरों की फूली हुई मोटी नसें स्पष्ट दिखाई दे रही थी, आँखे मृत मछलियों की तरह कांतिहीन दिखाई पड़ रही थी। उसके पाँव गाय के खुरों की तरह कठोर व भद्दे दिख रहे थे।
इस बार बेटे ने कहा , -"प्लीज, पापा ! कुछ दे दीजिए ना।"
बेटे के इस अनुरोध को सुनकर शायद उस अधमरे बूढ़े को थोडा-बहुत प्रोत्साहन मिल गया हो।
"-दे, दे, देदे, बाबू !"- कहते-कहते उसने अरविंद के शरीर को स्पर्श कर लिया। तत्क्षण चिल्ला उठा अरविंद।
-"ऐ भाग, भाग, बदमाश, दूर भाग !"
चिल्लाते-चिल्लाते लात मारने के लिए एक लात ऐसे उठा ली मानो कि बूढ़ा एक फुटबाल हो और वह उसको जोरदार किक मारकर से बहुत दूर फ़ेंक देना चाहता हो।
अरविंद का यह रौद्र-रूप देखकर डरने के बजाए सभी शर्मिंदगी का अनुभव कर रहे थे । जैसे बस-स्टैंड में उपस्थित प्रत्येक आदमी ने उनके मन के संकीर्ण-भाव पढ़ लिए हो । पहले बेटा वहाँ से हटकर दूर चला गया था, उसके पीछे-पीछे बेटी भी। रोते-रोते बूढ़ा कहने लगा, -"मारोगे मुझे, बाबू ! मारो, मारो, और मारो ।"
अरविंद को अपने कुकर्म के लिये कोई पछतावा नहीं था। पारिजात वहाँ से चले जाने के लिए सोच रही थी। दस्यु रत्नाकर का पाप उसका अपना पाप है।पारिजात के मुख से स्वतः निकल आया था, "छिः! छिः!"
अरविंद ने उत्कंठा के साथ पूछा था,-"क्या हुआ तुम्हें ?"
पारिजात ने कोई जबाव नहीं दिया था। उसकी आँखों की भाषा खुद-बखुद समझा दे रही थी- उन छिः ! छिः ! के भावार्थ।

5

प्रकृति के कई रहस्यों पर से पर्दा उठाने के बाद भी विज्ञान अभी तक कई गुत्थियों को सुलझा नहीं पाया है।जैसे- बादलों से रिम-झिम बारिश क्यों होती है? हर पल लहरें समुद्री किनारों पर क्यों टकराती हैं ? अंधेरी गुफा में असंख्य शुक्राणु दौड़कर एक भ्रूण का निर्माण कैसे करते हैं? मरने के बाद जीव की क्या गति होती है ? सूरज क्यों उगता है ? क्यों इच्छाओं का अंत नहीं होता है, दूब-घास की तरह उखाड़ने के बाद भी फिर क्यों पैदा हो जाती हैं ? भगवान को थकान क्यों नहीं लगती है ? हवा आराम क्यों नहीं करती है ? कोई भी माँ पुत्र-शोक से उबर क्यों नहीं पाती ? कभी-कभी उनके साथ ऐसा भी होता था। वह अकेली बैठी थी तो किसी कुहासे में खो गई थी, ठीक से उसे पता भी नहीं चला था कि वह कुहासा है या कोई बादल। सब कुछ अस्पष्ट व धुंधला दिखाई देने लगा था। बहुत दूर में नीले-रंग का एक सफारी-सूट दिखाई देता था। वह कुहासे भरे बादल में विचरण करती हुई उस सफारी-सूट को पकडने के लिए हाथ आगे बढ़ाती जाती थी। परन्तु कभी भी उस नीले सफारी सूट को छू नहीं पाती थी। बार-बार नीला सफारी सूट पहने हुए वह आदमी अस्पष्ट दिखाई देता था। वह अरविंद को पहचान लेती थी। तब उसे ऐसा लगता था मानो किसी डूबते हुए आदमी को तिनके का सहारा मिल गया हो। उस अवस्था में पारिजात हाथ बढ़ाकर अरविंद को जकड़ लेना चाहती थी। उसकी आँखों से आँसुओं की धारा फट पड़ती थी तथा आँसू बहकर कान के भीतर तक चले जाते थे। पारिजात के शून्य में तैरते हुए हाथ को अरविंद पकड़ लेता था। आँसू पोंछने लगता था और कहता था--
"क्या हुआ ? रो क्यों रही हो ? बहुत कष्ट हो रहा है ?" बिस्तर के पास दो अन्य आदमी खड़े थे।
अरविंद से पूछ रहे थे, -"क्या होश आ गया ?"
उस समय तक वह बादलों और कुहासों की दुनिया से लौट कर अपनी यथार्थ की दुनिया में आ गई थी । उसकी समझ में आ गया था कि वह नर्सिंग होम में भर्ती थी। पास वाले बिस्तर पर चौदह या पंद्रह साल की फ्राक पहने हुए लड़की सोई थी।उसके शरीर में सैलाइन लगा हुआ था।
अरविंद पास खड़े किसी आदमी को पूछ रहे थे -"इस लड़की को क्या हुआ है ?"
उस लडकी के पास बैठी हुई देहाती औरत जोर-जोर से रोने लगी। उसके रोने की आवाज से अरविंद और पारिजात दोनो चौंक गए थे। एक भले आदमी की तरह सज्जनता दिखाते हुए कुछ न पूछकर अरविंद चुप रहा। परंतु कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। कुछ समय बाद अरविंद ने उस लड़की के बारे में कहीं से कुछ जानकारी प्राप्त की । पारिजात के कान में कहने लगा –
"वह चौदह साल की लडकी गर्भवती हो गई है, अपने किसी रिश्तेदार मामा के द्वारा । लड़की का पिता उसको जान से मार देना चाहता था, मगर उसकी दादी ने गर्भपात कराने के लिए कुछ घरेलू नुस्खे का इस्तेमाल करते हुए जड़ी बूटी खिला दी। जिसके कुप्रभाव से बच्चा पेट के अंदर मरकर सड़ गया।शरीर में जहर फैलने से अब उस लडकी की हालत गंभीर है। इसलिए यहाँ भर्ती करवाया है । तीन दिनों से सड़ा हुआ मांस टुकडा-टुकडा होकर निकल रहा है।"
यह सुनकर पारिजात की आँखे डर से बंद हो गई। उसके पेट में दर्द हो रहा था, उल्टी करने का मन हो रहा था। वह दो-तीन बार उल्टी करने के लिए बिस्तर से उठकर बैठ गई थी। उसने लड़की की तरफ से अपनी नजरें हटा दी। अरविंद पारिजात के चेहरे की तरफ देख रहा था। बीच-बीच में उसकी पीठ भी सहला रहा था। पारिजात की आँखों से अनायास आँसू टपक कर कान के अन्दर चले जा रहे थे । यह देखकर अरविंद डॉक्टर को बुलाने गया था।
एक नर्स आकर पूछने लगी थी-"दर्द हो रहा है क्या ?" वह पारिजात को दर्द-निवारक गोली देकर चली गई। वह उस बिस्तर पर केवल दो घंटे से थी। देखते-देखते कुहासा, पेट का दर्द, उस लड़की को लेकर कौतूहल, वमन के साथ-साथ वह दर्दनाक क्षण भी स्वतः पार हो गया।
नर्सिंग होम छोड़ने से पहले वह लघुशंका करना चाहती थी। अरविंद उसको हाथ से पकडकर बाथरूम तक ले गया।लेकिन वह कहने लगी, "अभी मुझे ठीक लग रहा है ।मैं अकेली जा सकती हूँ । आप यहीं रुक जाइए । अरविंद उसका हाथ छोडकर बाहर प्रतीक्षा करने लगा।
बाथरूम से लौटते समय अचानक उसकी नजर कमोड के फ्लश बेसिन पर पड़ी। उसने देखा एक सफेद ट्रे में खून से लथ-पथ चार-पांच इंच का, इंसान का एक भ्रूण पड़ा था जैसे देव-शिशु की तरह वह सो रहा हो। यद्यपि आँख, कान, नाक, हाथ, पैर, लिंग स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहे थे, फिर भी देखने से ऐसे लग रहा था कि थोडी देर पहले ही अंडा फोडकर बाहर निकल आया हो। एक नीरव तपस्वी की तरह था वह भ्रूण। पता नहीं क्यों ? उस भ्रूण को देखने से उसका दिल हुम-हुम करने लगा। इच्छा हो रही थी ट्रे से उठाकर सीने से चिपका ले। उसे ट्रे में इस तरह छोडकर घर जाने का मन नहीं हो रहा था। बाथरूम का दरवाजा बाहर से कोई खटखटा रहा था। वह दरवाजा खोलकर बाहर निकली तो देखा सामने नर्सिंग होम की दाई 'रुक्मिणी' खड़ी थी। कहने लगी, "बाबू आपको लेने आए हैं । कहीं गुसल-खाने में चक्कर खाकर गिर तो नहीं गई यही सोचकर।" उसके बाद वह प्रसंग बदलकर बोली थी-"छि: ! ऐसा घिनौना काम कर रही हो ? इससे तो अच्छा -आपरेशन करवा लेना चाहिए।"
बूढ़ी की गुरुजन-सुलभ विरक्ति और उपदेश सुनने के बाद भी पारिजात यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, इस ट्रे में जो देवशिशु पड़ा है, यह क्या मेरा भ्रूण है ?
उस देवशिशु को सीने से लगाकर, मेरे प्यारे कहकर क्षमा माँगती, उससे पहले ही वह सिर झुकाकर बाहर निकल आई। जीवन के उस अक्षम्य-पाप के लिए उसे खुद से घिन लग रही थी। खुद को धिक्कार रही थी- छिः छिः ।




6
हल्की-ह्ल्की मूँछें आ रही थी, आँखे स्वच्छ व गोल हो रही थी, नाक सीधी हो रही थी, उस अवस्था में बेटा प्रवेश कर रहा था। तब एक दिन बेटे ने पारिजात को दो फुट की दूरी से कहा , - "छिः ! तुम्हारे शरीर से कितनी गंदी बदबू आ रही है !"
-"मेरे शरीर से बदबू ?"- हँसने लगी पारिजात।
-"बदबू या सुगंध ?"
-"छिः!, आप यहाँ से हटिए।"- बेटे ने मुँह फेरते हुए कहा ।
बेटे के चेहरे के बदले हुए रूप को देखने से आसानी से यह पता चलता था कि वह मजाक नहीं कर रहा है। उसके शरीर से बदबू, मगर कैसे ?
सर्दी का महीना था। पसीना निकलने का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसे भी गर्मी के दिनों में उसके शरीर से बहुत ही कम पसीना निकलता था। और अगर थोड़ा बहुत पसीना निकलता भी था,तो गंधहीन होता था।
अरविंद अक्सर कहता था-"-तुम्हारे शरीर से हर समय मीठी-मीठी मोहक खुशबू कहाँ से आती है ?"
उस समय वह या तो नींद से उठकर आती होती है या किचन के अंदर से।उस मीठी खुशबू को सूँघकर अरविंद मंत्र-मुग्ध हो जाता था। पारिजात उस खुशबू को सूँघने के लिए खुद ही अपना शरीर सूँघने लगती थी, मगर वह खुशबू नहीं मिलती थी।
बेटे की शिकायत दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। अंत में ऐसा होने लगा कि पारिजात को सामने से आता देख वह दूर चला जाता था। यह देख पारिजात ने अपने शरीर पर पाउडर लगाना शुरू कर दिया । कभी-कभी इत्र-फुलैल का भी उपयोग करने लगी । फिर भी बेटा उससे दूरी बनाए रखता था। धीरे-धीरे यह बात उसके लिए दुःख का कारण बन गई। दुःख बढ़कर विरक्ति में परिणत हो गया। कभी-कभी इस बात को लेकर झगड़ा भी होने लगता था। वह यह बात समझ नहीं पाती थी, ये सब कैसे हो जाता है। इसके बाद बेटे को सामने से आता देख वह खुद एक अछूत की भाँति साइड में खड़ी हो जाती थी अपने शरीर को सिकोड़कर।
खाने के टेबल पर भी वह बेटे के पास वाली कुर्सी पर नहीं बैठती थी, इस प्रकार वह उससे दूरी बनाए रखती थी। जितना वह खुद को सिकोड़ने का यत्न करती, उतना ही उसके मन की नाराजगी भी बढ़ती जाती। वह रोते-रोते कहने लगती थी, -"-तुम मेरे शरीर का एक अंश हो। मेरी अस्थि-मज्जा और रक्त से बने हुए हो। यह देख तेरी नाक मेरी नाक जैसी है। तेरी हँसी मेरी हँसी जैसी है। जब तुम मुझसे इतनी नफरत करते हो, तब मुझे बड़ा ही कष्ट होता है। तुम इस बात को नहीं समझ पाओगे कि तुम्हारे सामने आने से पहले मुझे कितनी हिचकिचाहट होती है।"
उसका रोना देखकर बेटा द्रवित हो जाता था , -"प्लीज, रोओ मत। प्लीज, दुखी मत होओ ।"
परन्तु उसके स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता था,पहले की भाँति दूर-दूर रहने लगता था। यह देखकर अरविंद बेटे से कहने लगता था,-"-ये तुम्हारा नया नाटक शुरु हुआ है। कहाँ से बदबू आ रही है ? बताओ तो"- कहते-कहते श्वान की तरह पारिजात के पूरे शरीर को सूँघने लगता, फिर वह कहने लगता,-"नहीं, कहीं बदबू नहीं है।"
पारिजात सोच रही थी शायद अरविंद अभी बोलेगा, तुम्हारे शरीर से महकी-महकी मधुर-मधुर खुशबू आ रही है, मगर अरविंद कुछ भी नहीं बोला। उसका मन दुःखी हो जाता था। यह सोचकर कि अभी वह खुशबू कहाँ गायब हो गई ? शरीर से बदबू या किसी दुर्गंध का निकलना अर्थात् बुढ़ापे की तरफ अग्रसर होने का प्रतीक।
नानाजी के शरीर से ऐसी ही अजीब-सी गंध निकलती थी। ठीक से यह नहीं कहा जा सकेगा, किस तरह की गंध ?- जिस प्रकार से पुरानी चीजों में पड़े-पड़े दुर्गन्ध आनी शुरू हो जाती है, जैसे पुराने केदारगौरी मंदिर के अंदर घुसने से एक विशिष्ट गंध की अनुभूति होती है, ठीक वैसी ही।
नानाजी का शरीर बूढ़ा हो गया था, नानाजी चार किलोमीटर का रास्ता पैदल तय कर आते थे। उनके पाँव की अंगुलियाँ सूजी हुई व लाल दिखाई देती थी। उनकी टाँगे पतले पाईप की तरह दिखाई दे रही थी। वे बाल-कॉमिक्स के चाचा चौधरी की तरह नहीं दिख रहे थे। वे मितभाषी थे। कहानी सुनाना तो दूर की बात, बच्चे लोगों के साथ बात भी नहीं करते थे। उनकी आँखों में चमक नहीं थी, चावल के मांड की तरह निस्तेज हो गई थी । वे बिल्कुल निरीह प्राणी की तरह दिख रहे थे। वे कृशकाय थे, इसलिए बैठते समय उनकी रीढ़ की हड्डी मुड़ जाती थी। देखने से अंग्रेजी के "जी" की तरह प्रतीत होते थे। प्रायः जब वे घर आते, पारिजात स्कूल जाने की तैयारी कर रही होती। माँ अपने काम में व्यस्त रहा करती थी। नानाजी अपने पाँवों में मोची द्वारा बनी टायर वाली चप्पलें पहना करते थे। चप्पलें खोलकर बिना किसी आवाज के ड्राइंग-रुम में आकर बैठ जाते थे। नानाजी के आने से उन लोगों को न तो कोई खुशी होती थी और न ही कोई दुःख। केवल माँ को सुनाई दे, इतने ही ऊँचे स्वर में वे लोग चिल्लाकर खबर दे देते थे, -" नानाजी आ गए हैं !"
अपना काम छोड़कर माँ दौड़कर कभी भी मिलने नहीं आती थी। नानाजी बैठकर पुराने अखबार, किताबें , यहाँ तक कि पुराने कागजी पैकेट, जो कुछ भी हाथ में आता था, उसी को उठाकर पढ लेते थे । बिना किसी चश्मे की मदद से अंग्रेजी अखबार के महीन-महीन अक्षर भी पढ़ रहे होते थे। पारिजात अपनी चोटी गूँथते-गूँथते भागकर बायें हाथ से चूल्हे पर चाय की केतली रख देती थी। जब तक दोनों तरफ की चोटियाँ बन जाती थी,चूल्हे पर चाय भी गरम हो जाती थी। बिना कुछ बोले नानाजी चुपचाप अखबार पढ़ने में लीन रहते थे,
पारिजात भी बिना कुछ बोले नानाजी के सामने चाय रखकर चली जाती थी। किसी भी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त किए बिना उस गरम चाय को वे पी लेते थे। पारिजात का स्कूल जाने का वक्त हो जाता था। वह माँ के पास जाकर कहने लगती थी,-"-माँ, नानाजी आए हैं न।"
-" आए हैं, तो आए हैं।"- निस्पृहता से उत्तर देती थी माँ।
-"आपके पिताजी आए हैं, आप इतना कड़वा क्यों बोल रही हैं ।"- पारिजात को माँ के इस व्यवहार पर क्रोध आता था। माँ फुसफुसाकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती थी । ,
-"उनको अफीम चाहिए, इसलिए बार-बार मेरे घर चले आते हैं। कहाँ से लाऊँगी इतना पैसा?"
-"धीरे बोल, कहीं वे सुन न लें।"- चिढ़कर कहने लगती थी पारिजात अपनी माँ को।
माँ भनभनाकर कहने लगती थी,-"इतना इतर क्यों रही है? जा, छत पर मेरी गीली साड़ी सूख रही है। उसके पल्लू में दो रुपए बंधे हुए है। लाकर दे, दे।"
पारिजात के स्कूल का समय हो जाता था, वह दौड़कर जाती थी छत पर। माँ की गीली साड़ी के पल्लू से खोलकर दो रुपए लाकर नानाजी के पास रख देती थी। नानाजी बिना कुछ बोले रुपए अपनी जेब में रख लेते थे। थोड़ी देर बैठते थे। फिर उठकर अपने टायर वाली चप्पलें पहनकर चले जाते थे। पारिजात का मन माँ के इस दुर्व्यवहार पर विद्रोह कर बैठता था । ऐसा लगता था, माँ निष्ठुर व कठोर हृदय वाली है।यह सोचते हुए छाती से अपनी किताबें चिपकाकर चली जाती थी वह।
इसी तरह बेटे को भी कई चीजे अच्छी नहीं लग रही थी। पारिजात की गोल-गोल पुष्ट बाहें, किसी भी विषय पर वाकपटुता के साथ अपनी राय देने का ढ़ंग, बाथरुम या रसोईघर में धीमे-धीमे गीत गुनगुनाने की आदत, इन सभी चीजों से उसे चिढ़ होने लगती थी ।
बेटे का मन रखने के लिए उसे देहाती औरतों की तरह बुद्धू होकर जीना चाहिए , जिसे वह कर नहीं सकती थी। जीजाबाई की तुलना में यशोदा जैसी माँ को वह पसंद करता था। माँ कहती थी, नानाजी कर्तव्य-परायण पिता नहीं थे, वे दायित्वहीन बाप थे। बच्चों के के लिए जीवन भर उन्होंने कुछ भी नहीं किया। जब स्वाधीनता-संग्राम चल रहा था, उसमें शामिल हो गए । नानीजी खेती-बाड़ी का सारा कार्य भार सँभालती थी , खेतों में मजदूर लगवा कर काम करवाती थी। शहर में जो घर था, उसको भाड़े पर दे रखा था । भाड़े के रुपए भी वह खुद लेने जाती थी । जब देश स्वाधीन हो गया, तब भी नानाजी ने कुछ नहीं किया। न तो नौकरी की, न ही कोई दुकानदारी , न खेती सँभाली , न ही राजनीति में कूदे। सिर्फ दारु पीते थे। यहाँ तक कि किराये में मिलने वाले रुपयों को नानीजी से माँगकर दारु में उड़ा देते थे। यह बात अलग है कि दारु पीकर कभी उन्होंने असंयत व्यवहार नहीं किया, न कभी अपने आपे से बाहर हुए । दारु पीने के बाद चुपचाप रसोई घर में नानीजी के पास आकर बैठ जाते थे। आस-पडोस में किसी को भी पता नहीं चलता था, नानाजी कब आए और कब चले गए। धीरे-धीरे जब नानी कमजोर हो गई, उनके हाथ-पाँवों ने काम करना बंद कर दि्या । अब वह खेत में खड़ी होकर काम नहीं करवा पाती थी, न ही किरायेदार से रुपए वसूलने शहर जा पाती थी। उस अवस्था में शहरवाले घर पर ताला झूलने लगा। नानाजी ने दारु के स्थान पर अफीम का सेवन शुरु कर दिया। पर नानीजी के गुजर जाने के बाद अफीम के लिए भी पैसों का जुगाड़ कर पाना असंभव सा हो गया था.
नानाजी ने कभी भी माँ से मुँह खोलकर पैसे नहीं माँगे थे। यह बात पारिजात भी जानती थी। उनके आने से पारिजात व माँ को यह ज्ञात हो जाता था, वह क्यों आए हैं? उन्हें देखते ही माँ चिड़चिड़ा जाती थी। माँ के लिए नानाजी क्या अनावश्यक बोझ बन गए थे, जिस तरह पारिजात अपने बेटे के लिए ?



7
पारिजात खुद अनजान होकर बहती चली जा रही थी , जैसे किसी स्रोत में तिनके या फूल बह जाते हैं । अच्छे -बुरे , पाप-पुण्य किसी भी तरह के विचार नहीं आ रहे थे उसके मन में। किस क्षण में, किस विधि-विधान से, अच्छे दिन या बुरे दिन में यह सब घटित हो गया, उसे बिलकुल पता ही नहीं चला। वह केवल बहती ही जा रही थी। अपने वास्तविक स्थान को छोडकर आगे और आगे। जब वह उफनती नदी के मध्य में पहुँची, तब उसे चेतना आई। उसे याद हो आया कि उसका अपना घर-संसार है, बाल-बच्चे हैं, सपने हैं, सुख-दुख हैं, ऐसे समय में संसार से विमुख होता है कोई ? मगर उसने संसार से मुँह मोड़ लिया था। वह अब अपने खुद के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। पारिजात का मन पूर्णतः पूर्णतया अस्थिर था।एक बार बेटे की साइकिल से दुर्घटना हो गई। इस दुर्घटना में उसके घुटनों पर गहरा घाव हो गया। पर उसने ऊफ तक नहीं की। भाग-दौडकर लोगों को इकट्ठा नहीं किया। उसके हिसाब से शायद दुनिया की हर अच्छी-बुरी लिस्ट में इस दुर्घटना का भी नाम अंकित था । एकबार जब अरविंद का ऑफिस में अपने बॉस के साथ झगड़ा हुआ, तब भी उसने पास बैठकर उनको किसी भी प्रकार की सांत्वना देने का प्रयास नहीं किया । बेटी ओडिया साहित्य में अनुतीर्ण हुई, उसने पास बुलाकर उसको लंबा-चौडा भाषण नहीं दिया। ‘जिसके हृदय में मातृभूमि, मातृभाषा के प्रति प्यार नहीं, वह नर नहीं निरा पशु समान है’- उपदेश वाली उक्तियां नहीं सुनाई। देखते -ही- देखते वह अशोच्य बातों पर मनन कर खुश होने लगी। किसी को भी उसका सुराग नहीं मिल पाता था। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे उसकी उम्र कम होती जा रही हो। खुद दर्पण के सामने खड़ी होकर बार-बार अपना चेहरा देखना पसंद करती थी।
"प्रेम और अध्यात्म में कुछ भी अंतर नहीं है।" वह अरविन्द से गंभीरतापूर्वक अपनी बात कह रही थी।-"दोनों में मुख्य-भाव होता है संसार से विमुखता। दोनों में प्राप्ति होती है एक परम आनंद की, एक प्रचंड पागलनपन की। दोनों में एकात्म होने की प्रवणता ही प्रमुख रहती है। दोनों का रास्ता काँटों से भरा, टेढ़ा-मेढ़ा, परन्तु दोनों की उपलब्धि और अनुभूति एक समान।"- उसकी ये बातें सुनकर अरविंद हँसते हुए कहता था, -"किसी प्रेमजाल में पड़ गई हो क्या ? या फिर प्रेम और अध्यात्म-विषय पर शोध करने की सोच रही हो। तुम्हारी मंजिल प्रेम है या तुम उससे बहुत आगे बढ़ गई हो। कौन जाने, आगे जाकर तुम द्वितीय ओशो न बन जाओ ?" अरविंद की इन बातों का पारिजात ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। मगर अरविंद भी चुपचाप नहीं बैठा। अवसर पाते ही एक दिन कहने लगा,
-"आजकल तुम्हारे गाल गुलाबी दिखाई दे रहे है, आखिर बात क्या है ?"
पारिजात ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की,
"-आलतू-फालतू की बात मत बोलो। ढलती उम्र के साथ-साथ जहाँ शरीर पर झुर्रियाँ पड़ने लगती है ,चेहरे की रौनक ख़त्म होने लगती है । वहाँ गुलाबी गाल...? क्या मजाक है !"
अरविंद कहने लगा,"-मगर तुम्हारा यह परिवर्तन मेरे लिए एक आश्चर्य की बात है। तुम्हारा स्वभाव पहले जैसा चिडचिडा भी नहीं रहा है। यह बात दूसरी है कि तुम बताना नहीं चाहती हो। पर एक दिन कुछ न कुछ तो जरुर बताओगी ।"-
पारिजात को मन -ही -मन भय होने लगा था कि कहीं अरविंद उस पर संदेह तो नहीं कर रहा है। संदेह, पर क्यों ? चार पहर-चौबीस घंटे लट्टू की तरह वह उसके घर-संसार के लिए घूमती रहती है, सभी का ध्यान रखती है। अपने लिए एक सेकेण्ड समय भी नहीं दे पाती है। जब इन सभी बातों का अंतर्मन से विश्लेषण करने लगती है, तब उसको अपना गोपनीय संबंध अधिक अर्थपूर्ण लगने लगता था। वह इस संबंध को जीवन भर सहेज कर रखना चाहती थी।
एक दिन अरविंद उसे खूब प्यार जताने लगा। उसके कोमल शरीर को जहाँ-तहाँ सहलाने लगा। अरविंद के इस रूप को देखकर पारिजात को आश्चर्य हो रहा था। इधर-उधर की पुरानी बातें करते-करते वह कहने लगा,
"-मैं तुम पर किसी भी प्रकार का शक नहीं कर रहा हूँ। ऐसे ही पूछ रहा हूँ, दुखी मत होना। जिंदगी में सब-कुछ संभव है। आकस्मिकता में किसका हाथ है ? बोलो तो ! भाग्य से ज्यादा और कौन प्रबल है ! इतने वर्षों तक हमने अपना घर-संसार सजाया, अब तक एक-दूसरे के संपूरक हो गए हैं। एक पल भी एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते हैं। अतः कोई अनहोनी घटना अगर तुम्हारे साथ घटित हुई हो, तो ऐसा मत सोचना कि हम एक दूसरे से अलग-थलग हो जाएँगे । सिर्फ इस बात को जानना चाहता हूँ कि मुझे छोडकर कोई अन्य ....."
इतना घुमा-फिराकर बातें न करके,अरविंद सीधा सवाल कर सकता था। अरविंद अपनी सज्जनता दिखाने के बजाय सीधे-शब्दों में पारिजात को यह प्रश्न पूछ सकता था। तभी घर का कॉल-बेल बजने लगा, अतः उस नाटक का वहीँ पटाक्षेप करते हुए पारिजात उत्सुकतापूर्वक दरवाजा खोलने लगी। पडोस वाले मिलने आए थे। वे ड्राइंग रूम में आकर बैठ गए थे। उसके बाद वह घरेलू कामों में व्यस्त हो गई। उस दिन अरविंद का प्यार दूसरे दिनों की तरह नहीं था। बच्चों को कभी प्यार से पुकारकर, कभी डांट-फटकारकर, कभी थप्पड़ मारकर बात निकलवाने के उद्देश्य से प्रतिपल अरविंद का स्वभाव परिवर्तित हो रहा था। उनके मन में समाहित संदेह ने विरक्ति का रूप धारण कर लिया था। छोटी-छोटी बातों में वह झगडने लगता था। जितना हो सकता था पारिजात खुद को नियंत्रण में रखती थी। उसका मन ग्लानि से भर जाता था, उसे ऐसा लगता था मानो वह अस्पृश्य, घृणित वेश्या बन गई हो। कई बार सोच रही थी, इन सारी बातों का राज खोल दें । मगर किससे बोलेगी ? कौन उसकी बातों पर विश्वास करेगा ? वह कहाँ से शुरु करेगी ? वह समझ नहीं पा रही थी। क्या वह यह कह पाएगी कि, रात होते ही उसका मन अधीर होने लगता है। हर पल उसे भारी लगने लगता है। जब सब सो जाते हैं। आधी रात को दबे पांवों वह आते हैं। उनके शरीर की महक पारिजात को सम्मोहित कर देती हैं। उस महक से सारा घर सुवासित हो उठता है। वह उसके नजदीक में आकर खडे हो जाते हैं। बिस्तर में घुटनों के बल बैठकर उसके होठों पर प्यार भरा चुंबन कस देते हैं। उत्तेजनावश पारिजात अपना शरीर उनको समर्पित कर देती है तथा कामक्रीड़ा के लिए तैयार हो जाती है। दीवार-घड़ी की टिक्-टिक् ताल के साथ उनका ताल मिल जाता है। शरीर और मन सुख से सुखातीत स्तर की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इतने दिनों के वैवाहिक जीवन में जो सुख उसे नहीं मिला, वह सुख उनसे प्राप्त करती है। लग रहा था जैसे यह सुख प्राप्त नहीं होने से उसका जीवन व्यर्थ हो जाएगा। जाने से पूर्व वह होठों पर अपने होठ चिपका लेते थे, अपनी जीभ को उसके मुख-विवर के भीतर घुसा देते थे।उसके पतले होठों से रसपान कर लेते थे। इसी रतिक्रिया में कब सुबह हो जाती थी, पता ही नहीं चलता था।
कभी-कभी शाम से ही पारिजात का मन अस्थिर हो जाता था। उसे ऐसा महसूस होने लगता था, वह आज नहीं आएंगे। यह सोचने मात्र से उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे। जब वह पूर्व रात्रि की अनुभूति के बारे में सोचने लगती थी, तभी उसकी नाभि के नीचे से एक सिरहन पैदा हो जाती थी ।
ये सारी बातें सुनने के बाद अरविंद का धैर्य कहीं जवाब तो नहीं दे देगा ? कहें या न कहें सोच-सोचकर इतने दिन बिता दिए थे पारिजात ने। अचानक एक दिन उसे लगा, ये सारी बातें और छुपाने से कोई फायदा नहीं है, अब वह समय आ गया है उसे बोल देना चाहिए, ताकि रोज-रोज के झंझट से उसे मुक्ति मिल जाएगी। अरविंद पहले-पहल ये सारी बातें सुनकर खूब हँसा था। बाद में गम्भीरतापूर्वक कहने लगा,- "साइकिक ।" - पारिजात को अपने कॉलेज जीवन की बात याद आ गई । ‘साइकिक’ वे लोग रीना मोहंती को कहते थे । वे दोनों लेडीज हॉस्टल के रूम नं. तेईस में रहा करती थीं । उसका स्वभाव पारिजात व अन्य लड़कियों की तरह नहीं था। ज्यादातर समय वह चुपचाप व गंभीर रहती थी। अपने बिस्तर पर सफेद चादर फैला रखी थी। उसी बिस्तर में डेढ़ फीट ऊंची त्रिभंगी कृष्ण भगवान की मूर्ति को भी रखती थी। टेबल पर कभी पढ़ाई नहीं करती थी, बिस्तर ही उसकी पढ़ाई का स्थान था। रात में उन्हीं कृष्ण भगवान की मूर्ति के साथ वह सोती थी, कभी भी यह नहीं बताती थी कि कृष्ण के साथ उसका क्या संबंध है। लड़कियां उसे मीरा पुकारकर चिढ़ाती थीं। दूसरे रूम की लड़कियां पारिजात से पूछती थी,-सच-सच बता तो, रात को वह कृष्ण भगवान की मूर्ति के साथ सोती है?" प्रायः रीना डाइनिंग हाल में खाना नहीं खाती थी। बिस्तर पर प्लास्टिक की चादर बिछाकर खाना खाती थी मानो उसके साथ कृष्ण भगवान भी खाना खा रहे हो। उस निर्जीव मूर्ति के साथ रीना के प्रेम संबंध को देखकर पारिजात को बड़ा अच्छा लगता था। उसे कभी-कभी आश्चर्य भी होता था। हॉस्टल गेट के पास अनेक लडके-लडकियों का सजीव प्रेम, उनका प्रेमालाप, उनका हँसी-मजाक देखने के बाद रीना का यह निर्जीव प्रेम उसे बड़ा ही हास्यास्पद लगता था। दो साल से हॉस्टल में एक साथ रहते हुए भी रीना ने केवल अपनी एक-दो गोपनीय बातें ही प्रकट की थी। पहली, यह कि वह शादी नहीं करेगी। दूसरी, यह कि जिस चीज के लिए औरतें शादी करना चाहती हैं, वह चीज उसे ऐसे ही मिल जाती है, इसलिए विवाह करने की उसे कोई आवश्यकता नहीं है।
पारिजात रीना को ‘साइकिक’ समझ रही थी। दूसरी लडकियाँ भी उसे पागल समझ रही थी। पारिजात की उपर्युक्त सारी कथा सुनने के बाद गंभीर होकर अरविंद ने उसको मनोरोगी का नाम दिया था। अरविंद पारिजात के संबंध में जो कुछ विचार रखते थे, उससे ज्यादा उसकी उत्सुकता पारिजात के प्रेमी के बारे में जानने की थी। अतः हर सुबह उठते ही पहला सवाल यही पूछता था, रात कैसे गुजरी ? हर रात को वह नहीं आते थे, इसलिए पारिजात बोलती थी,-
"अच्छी नहीं, वह नहीं आए।"-"तुम्हारा प्रेमी कैसा दिखाई देता है ? बातचीत करता है ? उसको सबसे ज्यादा क्या चीज पसंद है ?" पूछता था अरविंद। अरविंद के अलावा एक अन्य पुरुष पारिजात के जीवन में आ चुका था; उसने बड़े ही स्वाभाविक रुप से इस संबंध को स्वीकार कर लिया था।
कुछ भी अनहोनी घटना नहीं घटती थी बल्कि अंतरंग समय में वह प्रेमी पुरुष अरविंद के शरीर में समा जाता था, और पारिजात अरविंद के शरीर में अपने प्रेमी पुरुष को पाकर खुशी से झूम उठती थी।
सब-कुछ सुचारू रूप से चल रहा था। अरविंद के उपहास अथवा दोनों की कानाफूसी या फिर पारिजात की युवती-सुलभ चंचलता को देखकर बेटी को मानो कुछ सुराग मिल गया था कि उनके चार जनों के परिवार में कोई एक और जन भी मौजूद है। जब भी डाकिया कोई चिट्ठी देकर जाता था, बड़ी सावधानी के साथ उसका पता तथा हस्ताक्षर देखने लगती थी कि कहीं किसी नए आदमी का पता व हस्ताक्षर तो नहीं है ? फोन की घंटी बजते ही वह चुपके से रिसीवर उठाकर पुनः रख लेती थी, फिर भी उसको पता नहीं चल पाता था। वह पाँचवा आदमी कौन है, जो उनके घर में श्वास-प्रश्वास ले रहा है ?
वह कौन है, जो माँ-पिताजी के शयनकक्ष में प्रवेश कर सकता है ?
पारिजात ने एक दिन देखा कि किसी ने उसकी मोइस्चराइजर बोतल में पानी डाल दिया है, फेस-पैक ट्यूब को दबाकर सारा फेस-पैक निकाल दिया है, दीवार पर लिपस्टिक से तरह-तरह की आकृतियाँ बना दी है। एक के बाद एक बहुत कुछ घटित हो रहा था। एक दिन उसने देखा कि उसकी प्योर सिल्क साड़ी का किनारा किसी ने काट दिया है। वह गुस्सा होकर रोने लगी थी। परन्तु दोषी के बारे में उसे पता नहीं चल पाया था। पता नहीं क्यों उसका मन कह रहा था जरुर,यह सब उसकी बेटी ही कर रही है। यह सोचने के पीछे एक कारण था, दिन-ब-दिन उसका बदलता व्यवहार। जब भी उसे कुछ बोला जाता था, किसी बड़े का बिना यथोचित लिहाज किए तुरंत अंट-शंट उत्तर दे देती थी। वह पारिजात की कोई भी बात सुनना नहीं चाहती थी। यहाँ तक कि, जो बात या जो काम पारिजात को अच्छा नहीं लगता था,जानबूझकर बेटी उसी बात या काम को करती थी, पारिजात को चिढ़ाने के लिए। उसको यह बात समझ में आ गई थी कि किसी कारण से बेटी क्षुब्ध है। एक बार क्रोधित होकर कुछ अनर्गल भी बोलने लगी थी वह, -"तुम क्या सोच रही हो ? मुझे कुछ भी पता नहीं। मुझे तुम्हारी हर बात मालूम है।"- डर गई थी पारिजात। नहीं, नहीं करते हुए भी बहुत कुछ गोपनीय बाते रहती हैं हर मनुष्य के जीवन में, मरते दम तक जिसको वे कह नहीं पाते हैं। मरने के बाद चिता पर उसी के साथ जल जाती है वे सब बातें। बेटी ऐसी कौनसी बातें जानती है, सोचकर पारिजात को डर लगने लगा था।
उसे चेताने या किसी दूसरे कारण से, बेटी ने एक दिन कहा, -"तुम्हारी आँखों के नीचे बड़े-बड़े काले धब्बे हो गए हैं।" उसके बाद वह विद्रूप-हँसी हँसने लगी, उस हँसी को पारिजात कैसे भूलती ? बार-बार दर्पण के सामने खड़ी होकर ध्यानपूर्वक आँखों के नीचे काले धब्बों को देखने लगी । पारिजात अपने चेहरे पर की गई अपमानजनक टिप्पणी से दुखी हो रही थी। यह बात बेटी को अच्छी तरह से समझ मे आ गई थी , इसलिए जानबूझकर चिढाने या दुःख पहुंचाने के दृष्टिकोण से बोलती थी, -", तुम्हारे चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ रही है, तुम बूढ़ी जैसी दिखाई दे रही हो। तुम्हारे शरीर का रंग भी एकदम काला-कलूटा हो गया है।"-
एक बार पारिजात के बालों में से एक सफेद बाल उखाड़कर उसकी आँखों के सामने झुलाकर बेटी जोर-जोर से हँसने लगी थी।
बेटी के इस प्रकार के अशोभनीय व्यवहार ने उसको भीतर से बुरी तरह तोड़ दिया था, हालांकि उसकी बातों में कोई अतिरंजन नहीं था। कभी-कभार पारिजात अपने आपको समर्पित करते हुए कहने लगती थी, -"हाँ बेटी, अब मैं बूढ़ी हो गई हूँ।"- फिर भी उसके मन से क्षोभ दूर नहीं होता था। क्षोभ क्यों ? पारिजात का उसमें क्या दोष है ?
एक दिन उसने बेटी को पास बुलाया और कहने लगी, -"तुम्हें अपनी माँ के बारे में जितनी शिकायतें है, उन्हें सीधे-सीधे बता दो । मुझे तुम्हारा इस प्रकार का दुर्व्यवहार सहन नहीं होता है। एक चीज याद रख, तेरा जीवन तेरा है, मेरा जीवन मेरा है। मैं तुम्हारी जिंदगी में और दखलन्दाजी नहीं करूंगी और तुम मेरे जीवन में कोई हस्तक्षेप नहीं करोगी।"- वह गंभीर हो गई थी। कुछ देर बाद बेटी तिरस्कार भाव से कहने लगी,-"छिः !"-
पारिजात ने पूछा था- -"छिः ! क्यों ?" बेटी गुस्से से तमतमाकर कहने लगी, "मेरा मुंह मत खुलवाओ। मुझे विवश मत करो कि मैं अपना मुँह खोल दूँ ।

Comments

  1. इस अप्रतिम कथा के प्रभाव से मुक्त होने में पता नहीं कितना समय लगेगा.....अभी तो कुछ भी कहने की अवस्था में नहीं मैं....

    कोटिशः आभार इस कथा को पढने का सुअवसर देने के लिए....

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  2. adbhutaas... khubsurat kahaani... jyada badaayi karunga to is kahaani ka mahatva ghat jayega...

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  3. कहानी बहुत ही बढ़िया वृतांत हैं नारी के अंतर्मन का, और दिनेश कुमार माली जी को बधाई एक खनन-अभियंता होने के बावजूद कहानी का इतना अच्छा हमारी मातृभाषा में अनुवाद करने के लिए जिससे हमें भी इस कहानी को पढने का मौका मिला.

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  4. नारी के मनोभावों को उजागर करती,सुन्दर कहानी ।

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  5. जीवन के अनबुझ पहेलिओं को उजागर करने वाली यह कहानी मानव संपर्कों में फैली हुई दरारों का सूक्ष्म विश्लेषण सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करती है. शैशव से वयस्क जीवन तक हमारे अवचेतन मन में पनप रहे पापबोध तथा विसंगतियों को एक माला की तरह लेखिका ने बखूबी से पिरोकर पाठकों के सामने लाया है.
    समकालीन भारतीय रचना में यह कहानी पहली पंक्ति में रहना चाहिए.

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  6. कहानी वाकई बहुत अच्‍छी है। लेकिन बहुत लंबी है। अभी हमने दस पन्‍ने ही पढ़े हैं। इतने में ही कहानी ने मुझे मंत्रमुग्‍ध कर दिया। सरोजिनी व अनुवादक को ढेर सारी बधाईयां।

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  7. Rakesh Sharma1:51 AM

    आदरणीय माली जी,

    ओडिया लेखिका श्रीमती साहू की कहानी छी: का आपके द्वारा किया गया अनुवाद पढ़ा । अच्छा लगा । अनुवाद ऐसा बन पड़ा है कि मूल हिंदी की ही कहानी की तरह लगता है । मेरा घर संबलपुर में ही है और मैं यहां राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान, गोवा में हिंदी अधिकारी के पद पर कार्यरत हूं । मैं भी ओड़िया का स्तरीय साहित्य हिंदी में अनुवाद करना चाहता हूं, कृपया मार्गदर्शन करें । चूंकि मेरे पिता डा. मुरारी लाल शर्मा भी हिंदी के रिटायर्ड रीड़र रह चुके हैं अत: MCL के बेहेरा बाबु और हरिश्चन्द्र शर्मा जी से भी अपना परिचय है । साहित्य प्रेमियों के बीच में संवाद हो तो सृजनात्मकता को नया आयाम मिल सकता है । इसी बजह से आपसे संपर्क किया । अगर आपकी पुस्तक न हन्यते: के एक प्रति भेज सकें तो अनुग्रह होगा ।

    सादर


    राकेश शर्मा
    हिंदी अधिकारी
    एन.आय.ओ.
    गोवा

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