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Showing posts from January, 2010

माया

(भारतीय संस्कृति में अपनी जड़ें फैलाता वैश्विक बाज़ारवाद ,उपभोगवाद की प्रवृति, धनोपार्जन के भ्रष्ट तरीकें एवं झूठी प्रतिष्ठा की ललकहमारी संस्कृति कोकिस तरह खोखला कर रहीं हैं, इसकाज्वलंतउदाहरण पेश करनेवालीयह कहानी २००५ में लिखीगईथी,जोलेखिकाके कहानी-संग्रह 'सृजनी-सरोजिनी' में संकलित हुई है..सरकारी ,गैर-सरकारीएवंआधौगिकसंस्थाओंके अन्तर्निहितसंगठनात्मकपदानुक्रमव्यवहारके यथार्थधरातल का वर्णन करनेवाली यहप्रभावशाली कहानी हिंदी पाठकों को सत्य के बारे में सोचने पर विवश कर देगी. अनुवाद के दौरान मैंने लेखिका की भाषा शैली को अक्षुण्ण रखने की चेष्टा की है और आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास पाठकों को पसंद आएगा.)माया