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Showing posts from July, 2009

बेडी

(कहानीकार की यह कहानी उनके ओडिया कहानी संग्रह 'सृजनी : सरोजिनी' (प्रकाशक: अग्रदूत, कटक) में संकलित है. कहानी का अंग्रेजी अनुवाद गोपा नायक द्वारा Shackles शीर्षक से " इंडियन जर्नल ऑफ़ पोस्ट कोलोनिअल लिटरेचर" (ISSN : 0974-7379) के जून २००९ अंक में प्रकाशित हो चुका है. कहानी सही मायने में कहानीकार के नारीवादी दृष्टिकोण को उजागर करती है.)


बेडी
ऐसा लग रहा था, मानों हम एक खंभे के चारों तरफ चक्कर लगा रहे हो. बहुत ही कष्ट लग रहा था. ऐसा भी प्रतीत होने लगा था, जैसे हमारे पास इसके सिवाय कोई उपाय ही न हो. हम दोनों एक दूसरे से एक क्षण के लिए भी अलग नहीं हो पा रहे थे.

मैं उसको समझा-समझा कर थक गयी थी, पर वह थी कि उसको कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. अंत में, तंग आकर, मैंने उस विषय पर अपना सिर नहीं खपाने का निश्चय कर लिया. उसको जो समझ में आये, समझे, जो करना चाहती, करे. मैं यह नहीं कह सकती थी कि यह घटना महज एक सामान्य थी अथवा गंभीर. मेरी दृष्टि में तो वह घटना सामान्य नजर आ रही थी, जबकि उसके हिसाब से तो, वह बहुत ही सीरियस घटना थी. दिक्कत तो इस बात की थी. दुगनी उत्तेजना के साथ वह अपनी बात…