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बलात्कृता

यह कहानीकार की सद्यतम प्रकाशित कहानियों में से है, जो न तो किसी दूसरी भाषा में अनुदित हुई है, न किसी कहानी संग्रह में संकलित हुई है.यह कहानी 'टाईम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप'की ओड़िया पत्रिका 'आमो समय' के जून , २००९ अंक में प्रकाशित हुई है. कहानी का मूल शीर्षक 'धर्षिता' था , पर 'धर्षिता'शब्द हिंदी में न होने के कारण मैंने उस कहानी का शीर्षक'बलात्कृता' रखना उचित समझा. कहानीकार की सद्यतम कहानी का प्रथम हिंदी अनुवाद पेश करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है. बलात्कृताक्या सभी आकस्मिक घटनाएँ पूर्व निर्धारित होती है? अगर कोई आकस्मिक घटना घटती है तो अचानक अपने आप यूँ ही घट जाती है; जिसका कार्यकरण से कोई सम्बन्ध है? बहुत ही ज्यादा आस्तिक नहीं थी सुसी, न बहुत ज्यादा नास्तिक थी वह. कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि ये सब बातें मन को सांत्वना देने के लिए केवल कुछ मनगढ़ंत दार्शनिक मुहावरें जैसे है.सुबह से बहुत लोगों का ताँता लगने लगा था घर में. एक के बाद एक लोग पहुँच रहे थे या तो कौतुहल-वश देखने के लिए या फिर अपनी सहानुभूति प्रकट करने के लिए. घर पूरी तरह से अस्त-व्यस्त था. …