छिः!
( कहानी 'छिः!' कहानीकार की सफलतम नारीवादी कहानियों में से एक है। इस कहानी में नारी के अंतर्मन के कई गोपनीय पहलुओं पर अति-सूक्ष्मता से प्रकाश डाला गया है । यह कहानी मूल रूप से नब्बे के दशक में लिखी गई थी.। सर्व-प्रथम यह कहानी ओडिया पत्रिका 'झंकार' में प्रकाशित हुई और बाद में लेखिका के कहानी-संग्रह "दुःख अपरिमित" (ISBN : 81-7411-483-1) में संकलित हुई । ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में शोध कार्यरत प्रतिष्ठित लेखिका गोपा नायक ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद Hatred शीर्षक से किया है,जो वेब-पत्रिका Thanal On Line में प्रकाशित हुआ है ।) 1 उसके घुँघराले बालों में कंघी करने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी। सर्पिल लटों के गुच्छे के रूप में बाल बिखरकर आँख, कान, नाक के ऊपर गुलदस्ते की तरह झूलने लगते थे। जब भी नानी उनके घर मिलने आती थी, तो अपने साथ बहुत सारी छोटी-मोटी चीजें लेकर आती थी। कभी-कभी अरण्डी का तेल भी साथ लेकर आती थी। रस्सी से बुनी हुई खटिया में बैठकर गोंद जैसे चिपचिपे अरंडी के तेल को लगाकर गाय के सींग से बनी कंघी से जब नानी उसके बाल बनाती थी , तो उसे रोये...